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Coles Dushkarm aur Narak ki Yatnaye at Village Green Shopping Centre in Vernon, BC
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"दो शब्द
(कृति- दुष्कर्म और नरक की यातनाएं)
सभी धर्मात्माओं को अक्षयरुद्र का नमन् । यह पुस्तक मात्र उन लोगों के लिए एक चेतावनी है जो अपने स्वार्थ के लिए किसी न किसी रूप में किसी न किसी मनुष्य का शोषण कर रहे हैं । इस पुस्तक में किस प्रकार के पापों का क्या क्या दण्ड है यह बताया है।
हम अपने लिए सुख चाहते हैं यह गलत नहीं पर किसी का धन या वस्तु हड़पना , अपने पद या विभाग का दुरुपयोग करके रिश्वत लेना या साम दाम दण्ड और भेद से किसी को नीचा दिखाना और अपमानित करना यह सब अधर्म है और इस अधर्म का फल दरिद्रता , दुर्घटना या अस्पताल में धन खर्च और मानसिक आघात के सिवाय और कुछ नहीं ।
किसी परायी नारी से व्याभिचार अथवा उससे मिथ्या वादे करके उसके तन से अपनी पिपासा शान्त करने के लिए जालसाजी करना अनुचित और भयंकर पाप है जिसके लिए पुनर्जन्म में नपुंसकता, नवग्रह की पीड़ा और अन्य प्राकृतिक विक्षेप हैं और यहाँ कानून का दण्ड अलग ।
जिस प्रकार आप अपनी पत्नी और युवा पुत्री की सुरक्षा चाहते हो उसी प्रकार प्रत्येक मानव भी यही पवित्रता चाहते हैं। अतः दूसरों के साथ भी वैसा ही व्यवहार करो जो तुम अपने प्रति चाहते हो तभी यह विश्व सुरक्षित रहेगा और यहाँ दसों दिशाओं में अक्षय आनंद की वर्षा होगी।
यह रचना अक्षयरुद्र की 12 वीं कृति है जो जीवन जीने की कला सिखाने के लिए आपके कर कमलों में समर्पित है अतः आशा है कि आप अपने स्वार्थ के लिए छल कपट नहीं करोगो और स्वयं की शान्ति के लिए ईर्ष्या-द्वेष का त्याग करोगे।
कहना बहुत कुछ है पर पुस्तक में आप हमारे संपूर्ण भाव जानकर इस विश्व में अमृत का सिंचन करें बस इसी के साथ पुनः आपको आपके उज्जवल भविष्य के लिए शुभ कामनाएं।
आपका शुभ चिंतक
शंकराचार्यांश ब्रह्मानंद अक्षयरुद्र अंशभूतशिव"
"दो शब्द
(कृति- दुष्कर्म और नरक की यातनाएं)
सभी धर्मात्माओं को अक्षयरुद्र का नमन् । यह पुस्तक मात्र उन लोगों के लिए एक चेतावनी है जो अपने स्वार्थ के लिए किसी न किसी रूप में किसी न किसी मनुष्य का शोषण कर रहे हैं । इस पुस्तक में किस प्रकार के पापों का क्या क्या दण्ड है यह बताया है।
हम अपने लिए सुख चाहते हैं यह गलत नहीं पर किसी का धन या वस्तु हड़पना , अपने पद या विभाग का दुरुपयोग करके रिश्वत लेना या साम दाम दण्ड और भेद से किसी को नीचा दिखाना और अपमानित करना यह सब अधर्म है और इस अधर्म का फल दरिद्रता , दुर्घटना या अस्पताल में धन खर्च और मानसिक आघात के सिवाय और कुछ नहीं ।
किसी परायी नारी से व्याभिचार अथवा उससे मिथ्या वादे करके उसके तन से अपनी पिपासा शान्त करने के लिए जालसाजी करना अनुचित और भयंकर पाप है जिसके लिए पुनर्जन्म में नपुंसकता, नवग्रह की पीड़ा और अन्य प्राकृतिक विक्षेप हैं और यहाँ कानून का दण्ड अलग ।
जिस प्रकार आप अपनी पत्नी और युवा पुत्री की सुरक्षा चाहते हो उसी प्रकार प्रत्येक मानव भी यही पवित्रता चाहते हैं। अतः दूसरों के साथ भी वैसा ही व्यवहार करो जो तुम अपने प्रति चाहते हो तभी यह विश्व सुरक्षित रहेगा और यहाँ दसों दिशाओं में अक्षय आनंद की वर्षा होगी।
यह रचना अक्षयरुद्र की 12 वीं कृति है जो जीवन जीने की कला सिखाने के लिए आपके कर कमलों में समर्पित है अतः आशा है कि आप अपने स्वार्थ के लिए छल कपट नहीं करोगो और स्वयं की शान्ति के लिए ईर्ष्या-द्वेष का त्याग करोगे।
कहना बहुत कुछ है पर पुस्तक में आप हमारे संपूर्ण भाव जानकर इस विश्व में अमृत का सिंचन करें बस इसी के साथ पुनः आपको आपके उज्जवल भविष्य के लिए शुभ कामनाएं।
आपका शुभ चिंतक
शंकराचार्यांश ब्रह्मानंद अक्षयरुद्र अंशभूतशिव"
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