Village Green Shopping Centre | Vernon's Premier Shopping Destination
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अफ़ग़ानिस्तान की जो तस्वीरें इधर दशकों से हमारे ज़ेहन में आ-आ कर जमा होती रही हैं, ख़ून, बारूद, खँडहरों और अभी हाल में जहाज़ों पर लटक-लटक कर गिरते लोगों की उन तमाम तस्वीरों का मुक़ाबला अकेला काबुलीवाला करता रहा है, जो हमारी स्मृति की तहों में आज भी अपने ऊँचे कंधों पर मेवों का थैला लटकाए टहलता रहता है।
यह किताब उसी काबुलीवाले के देश की यात्रा है जिसे लेखक ने 1977 के दौरान अंजाम दिया था। तेईस साल की उम्र में बहुत कम संसाधनों और गहरे लगाव के साथ लेखक ने पैदल और बसों में घूम-घाम कर जो यादें इकट्ठा की थीं, इस किताब में उन्हें, तमाम ऐतिहासिक-भौगोलिक जानकारियों, तथ्यों के साथ सँजो दिया है। आज की पृष्ठभूमि में इसे पढ़ना एक अलग तरह का सुकून देता है, और इसे पढ़ना यह जानने के लिए ज़रूरी है कि बीती चार दहाइयों ने दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत जगहों में एक, अनेक धर्मों की भूमि रहे उस देश से क्या-क्या छीन लिया है।
विश्व की बड़ी सैन्य ताक़तों के ख़ूनी खेल का मोहरा बनने से पहले का यह अफ़ग़ानिस्तान-वर्णन बर्फ़ीली घाटियों, पहाड़ों के बीच मोटे गुदगुदे गर्म कपड़ों में गुनगुनी चाय का प्याला हाथों में दबाए, राजकपूर की फ़िल्मों के गाने सुनने का-सा अहसास जगाता है।
अफ़ग़ानिस्तान की जो तस्वीरें इधर दशकों से हमारे ज़ेहन में आ-आ कर जमा होती रही हैं, ख़ून, बारूद, खँडहरों और अभी हाल में जहाज़ों पर लटक-लटक कर गिरते लोगों की उन तमाम तस्वीरों का मुक़ाबला अकेला काबुलीवाला करता रहा है, जो हमारी स्मृति की तहों में आज भी अपने ऊँचे कंधों पर मेवों का थैला लटकाए टहलता रहता है।
यह किताब उसी काबुलीवाले के देश की यात्रा है जिसे लेखक ने 1977 के दौरान अंजाम दिया था। तेईस साल की उम्र में बहुत कम संसाधनों और गहरे लगाव के साथ लेखक ने पैदल और बसों में घूम-घाम कर जो यादें इकट्ठा की थीं, इस किताब में उन्हें, तमाम ऐतिहासिक-भौगोलिक जानकारियों, तथ्यों के साथ सँजो दिया है। आज की पृष्ठभूमि में इसे पढ़ना एक अलग तरह का सुकून देता है, और इसे पढ़ना यह जानने के लिए ज़रूरी है कि बीती चार दहाइयों ने दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत जगहों में एक, अनेक धर्मों की भूमि रहे उस देश से क्या-क्या छीन लिया है।
विश्व की बड़ी सैन्य ताक़तों के ख़ूनी खेल का मोहरा बनने से पहले का यह अफ़ग़ानिस्तान-वर्णन बर्फ़ीली घाटियों, पहाड़ों के बीच मोटे गुदगुदे गर्म कपड़ों में गुनगुनी चाय का प्याला हाथों में दबाए, राजकपूर की फ़िल्मों के गाने सुनने का-सा अहसास जगाता है।
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